है? «७:

#*न्के

//९४९०7/८६ 70 7/7९ 7.78724 72५ 0७ //7८

एशाएडएडापएश 09 7080707.0 ८) 0£574086 ०६ ६४७ फ्मं &07

00०फ्ापं 88450767 £07 [76७१8 , 00७४७

०5७ १९०४-64 रत &+०क शक सतत मल कआ5-पंनकी4 १० ;

है 00000000020000000(00000000000020202४2(0४002

श्रीहरिः श्रीमन्‍्महर्षि वेद॒व्याप्तप्रणीत

महाभारत.

( पन्नम खण्ड )

[ शान्तिप्व ] ( सचित्र, सरल हिंदी-अनुवादसहित )

कतककतक्तक्तकक्क़कक़क्क्क्क्द्‌

0000000000000000000000000000000000000000000000000000000002/000/000(000/2

६) मीन,

मुद्रक॑ तथा प्रकाशक हनुमानप्रसाद पोद्दार गीताप्रेस, गोरखपुर

इस खण्डका मूल्य ११॥) साढ़े ग्यारह रुपया पूरा महाभारत सठीक (छः जिल्दोमे ) मूल्य ६०)

ना

टी +| (५ 3 धर अर

| ॥8086क्‍95 £“5]॥

है. #/”] . | 'क# ही 2 हा ५७.५

०/-+- लतध्नग) +१३

की ८4 >>: 2

'फका

१8992[9 _

पता-गीताप्रेस, पो* गीताप्रेस ( गोरखपुर )

ओऔरइरिः

शान्तिपव

विषय

अध्याय पृष्ठ-संख्या ( राजधमोनुशासनपत ) १-युधिष्टिरके पास नारद आदि महर्षियोंका आगमन

और युधिष्टिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका बृत्तान्त पूछना ४४२५ २-नारदजीका कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसज्ञ सुनाना ४४२८ ३-कण को ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परञ्ुरामजीका शाप ४४३० ४-कर्णकी सहायतासे समागत राजाओंको पराजित करके दुर्योधनद्वारा खयंवरसे कलिज्ञराजकी कन्याका अपहरण . * “#| ६३२ ५-कर्णके बछ और पराक्रमका वर्णन उसके द्वारा जरासंधकी पराजय और जरासंधका कर्णको अज्ञदेशमें मालिनी नगरीका राज्य प्रदान करना ४४३३ ६-युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और ब्रियोंकोी युधिष्टिरका शाप ७-युघधिष्टिरका अजुनसे आन्तरिक खेद प्रकट 3 अल हुए. अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना “*' 2३५ ८-अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए." उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए. यशानुष्ठानके लिये प्रेरित करना है ९-युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय *** ४४४१ १०-भीमसेनका राजाके लिये संन्यासका विरोध करते हुए अपने कर्तव्यके ही पालनपर जोर देना ४४४३ ११-अजुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संबादका उल्लेखपूर्वक ग्रहस्थ-धर्मके पालनपर

४४२८

अध्याय विषय

१७-युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा १८-अजुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना पी १९-युधिष्टिरद्वारा अपने मतकी यथारथंताका प्रतिपादन २०-मुनिवर देवस्थानका राजा युधिष्ठिरको यज्ञा- नुष्ठानके लिये प्रेरित करना २१-देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश २२-क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुनः राजा युधिष्ठटिरको समझाना २३-व्यासजीका शद्धु और लिखितकी कथा सुनाते .. हुए. राजा सुघुम्नके दण्डधर्मपालनका महत्त्व सुनाकर युघिष्ठिरको राजधर्ममें ही दृढ़ रहनेकी आज्ञा देना

सुनाकर उन्हें राजोचित कर्दव्यका पालन करनेके लिये जोर देना *** २५-सेनजित॒के उपदेशयुक्त उद्बारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना २६-ेुधिष्ठिरके द्वाण धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन २७--युधिष्ठिकी शोकबश शर्रीर त्याग देनेके लिये 'उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना २८-अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी

जोर देना आए 2 १२-नकुलका गहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा प्रबछतता बतत्मते हुए; व्यासजीका भरुधिष्टिरको युधिष्टिरको समझाना ४४४७ ज़्शाना १३-सहदेबक़ा युधिष्ठिको ममता और आसक्तिसे २९-श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सुंजय-संबादके रूपमें रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना *** ४४५० सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर १४-द्रौपदीका युधिष्ठिर्को युधिष्ठिसके शोकनिवारणका प्रयत्न श्थ्वीका शासन करनेके लिये प्रेरित करना *** ४४५१ ३०-महर्षि नारद और प्व॑तका उपाख्यान *** १५-अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन*** ४४५४ ३१-सुवर्णीबीके जन्म) मृत्यु और पुनर्जीवनका भीमसेनका राजाको भुक्त दुश्खोंकी स्मृति वृत्तान्त कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके २२-व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको रोज्य-शासन और यशके लिये प्रेरित करना *** ४४५७ समझाना

पृष्ठ-संख्या

# 4 #+ ४४५९

/ ४४६९१

४४५६४

/ ४४५६६ ** ४४६७

डंड४प८

* ४४६९ >- २४-व्यासजीका थुधिष्टिरको राजा हयग्रीबका चरित्र

* ७४७२ “* ४४७५

्जु४७८

डं४८०

* ४४८२

४" ४४८६

४४९६

४४९९

४५९०२

६०

महाभारत

हि--००७+-४० ७-२५“ स्फप्टाटय भा “अर उप ननह उकायछ-य+ <मअप्करायअनप पाक क्र: 2 हज मगउान्‍पक कक वन्य कम. 33 पानपर नरक ००० का जाय -नन्‍न्‍फ-४ + तप ०अनक८ <23फ< पक :्> पा“ कम मन यमन >पपरपल-क्‍क- >० २००० ८६००० “कप ४7 वज

है ३-व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबछता बताकर देवासुर-संग्रामके उदाहरणसे ध्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्वित्त करनेकी आवश्यकता बताना * ४५०४ ३४-जिन करम्मोंके करने और करनेसे कर्ता प्रायश्रित्तका भागी होता ओर नहीं होता उनका विवेचन 8४ *** ४५०७ ३५-पापकमंके प्रायश्रित्तोंका वर्णन * ४५०९ ३६-स्वाय म्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप) पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्रित्त, अभक्ष्य वस्तुओं का वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन * ४५१२ ३७-व्यासजी तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण आशज्ञासे महाराज युधिष्ठटिरका नगरमें प्रवेश * ४५१६ ३८-नगर-प्रवेशके समय पुरवासिरयों तथा ब्राह्मणों- द्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा बध ३९-चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्ण-

४५१९

द्वारा वणन... ४५२१ ...£?-युधिष्ठिरका राज्याभिषेक * ११३२

४१-राजा युधिष्ठटिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोको विभिन्‍न कार्योपर नियुक्त करना “** ४२-राजा युघधिष्ठिर तथा धृतराष्ट्रका युद्धमें मारे गये सगे सम्बन्धियों तथा अन्य राजाओंके लिये श्राद्धकर्म करना. * ४५२५ ४३-युधिष्ठिरद्धारा भगवान्‌ श्रीकृष्णकी स्तुति ४५२६ ४४-महाराज युधिष्ठिरके दिये हुए विभिन्‍न भवनोंमें भीमसेन आदि सब भाइयोंका प्रवेश ओर विश्राम ४५२७ ४५-युधिष्ठटिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन “** ४६-युधिष्ठिर ओर श्रीकृष्णका संवाद) श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा ओर युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश * ४५३० ४७-भीष्मद्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णकी स्तुति--- ४५३२ ४८-परशुरामजीद्वारा होनेवाले क्षत्रियसंहारके विषयमें राजा युधिष्ठिरका प्रश्न “४५४१ ४९-परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश

४५२४

४५२८

और पुनः उत्पन्न होनेकी कथा * ४७५४२ कक ५०-श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सबिस्तर वर्णन #१* * ४५४८

१-भीष्मके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्ण-

का भीष्मकी प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिरके

लिये धर्मापदेश करनेका आदेश * ४५५० ५२-भीष्मका अपनी असमथथता प्रकट करना

भगबानका उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं

पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके

वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना ३-भगवान्‌ श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा

उनका संदेश पाकर भाइयोौंसहित युधिष्ठटिरका

उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना * ४५५४ ५४-भगवान्‌ श्रीकृष्ण ओर भीष्मजीकी बातचीत” ** ४५५६ ५५-भीष्मका युधिष्ठिरके गरुण-कथनपूर्वकक उनको

प्रश्न करनेका आदेश देना) श्रीकृष्णका उनके

छजित और भयभीत होनेका कारण बताना और

भीष्मका आश्वासन पाकर युधिष्ठिरका उनके

समीप जाना * ४५५८ ५६-य_ुधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका

वर्णन राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी

आवश्यकता; ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा

राजाकी परिहासशीछता और मृदुतासे प्रकट

होनेबाले दोष + ४५६० ५७-राजाके धर्मानुकूछ नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन "" ४५६४ ५८-भीक्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा

संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना

और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त

होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश *"* ४५६७ ५९-त्ह्माजीके नीतिशात्रका तथा राजा प्रथुके

४५५२

चरित्रका वणन * ४५६९ ६०-वर्णधमका वर्णन * ४९" ४५७८ ६१-आश्रमधमंका वर्णन *** ०" ४५८२ ६२-ब्राह्मणधर्म और कतंव्यपालनका महत्व *** ४५८४

६३-वर्णाश्रमधमंका बर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता ४५८५ ६४-राजधमंकी श्रेष्ठताका वर्णण और इस विषयमें इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद ६५-इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद &६६-राजधमंके पाछनसे चारों आश्रमोंके धर्मका फल मिलनेका कथन *** ** ४५९२ ६७-राष्ट्रकी रक्षा और उन्‍नतिके लिये राजाकी आवश्यकताका प्रतिपादन * ४५९५ ६८-वसुमना और बृहस्पतिक संवादमें राजाके होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे छाभका वर्णन ४५९७ ६९-राजाक प्रधान कर्तंव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका बर्णन

४५८७ ४५९०

४६०९१

शान्तिपवे ६१

७०-राजाको इहलोक और परलोकरमे सुखकी प्रासति करानेवाले छत्तीस गु्णोका वर्णन *** ४६०८ ७१-घधर्मपूर्वंक प्रजाका पालन हवी राजाका महान धर्म है; इसका प्रतिपादन *** ४६०९ ७२-राजाके लिये सदाचारी विद्वान पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापाछनका महत्व. *** ४६१२ ७३-विद्वान्‌ सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्रान्‍्षण और क्षषत्रियमें मेल रहनेसे छाभ- विषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान * ४६१३ ७४-त्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे छाभका प्रतिपादन करनेवाल्य मुचुकुन्दका उपाख्यान ९८१. ४६१७ ७५-राजाके कर्त॑व्यका वर्णन) युधिष्ठिरकः राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुनः राज्यकी महिमा सुनाना स् हक हैं ७६-उत्तम-अधम ब्राह्मणोंके साथ राजाका बर्ताव ' ** ४६२१ ७७-केकयराजा तथा राक्षसका उपाख्यान_ और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन *** ४६२२ ७८-आपत्तिकाल्में ब्राह्मणके लिये वेश्यबृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा छटेरॉँसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शर्त्रधारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना * ४६२५ ७९-ऋत्यिजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता "7 उद्रट ८०-राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन *** ४६२९ ८१-कुठम्बीजनोंमें दल्बंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्‍या करना चाहिये ! इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद *** ४६३२ ८२-मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतक रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान ६डई ३५ ८३-सभासद्‌ आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त- मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश “** ४६४० ८४-इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व *** ४६४२३ ८५-राजाकी व्यावहारिक नीति) मन्त्रिमण्डलका संघटन, दण्डका औचित्य तथा दूत द्वारपाल) शिरोरक्षक, मन्‍्त्री और सेनापतिके गुण *** ४६४४ ८६-राजांके निवासयोग्य नगर एबं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश *** ४६४७

८७-राष्ट्रकी रक्षा तथा बृद्धिके उपाय ४: ४६४९ ८८-प्रजासे कर लेने तथा कोश संग्रह करनेका प्रकार ४६५२ ८९-राजाके कतंव्यका वर्णन * ४६५४ ९०-उतथ्यका मान्धाताको उपदेश--राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता *** ४६५६ ९१-उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्व ओर

राजाके धर्मका वर्णन !-०३६५९ ९२-राजाके धर्मपृवक आचारके विषयमें वाम- देवजीका वसुमनाकों उपदेश * ४६६३

९३-वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन ४६६४ ९४-वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये

हितकर बर्ताव जे * ४६६७ ९५-विजयाभिलछाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव

तथा युद्धनीतिका वर्णन “** * ४६६८ ९६-राजाके छलरहित धम्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा ४६६९ ९७-आूरवीर क्षत्रियोंके कतंव्यका तथा उनकी

आत्मझुद्धि और सद्गतिका वर्णन * ४६७१ ९८-इन्द्र और अभ्बरीषके संवादमें नदी और

यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें

जूझते हुए मारे जानेवाले झूरवीरोंको उत्तम

छोकोंकी प्राप्तिका कथन * ४६७२३ ९९-शूरवीरोंको खर्ग और कायरोंको नरककी

प्राप्तिके विषयरमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास ४६७८

१० ०-सैन्यसंचालनकी रीति-नीतिका वर्णन * ४६७९ १०१-भिन्न-भिन्न देशके योद्धाओंके खभाव) रूप) बल) आचरण और छक्षणोंका वर्णन *. ४६८३

१०२-विजयसूचक शुभाशुभ छक्षणोंका तथा उत्साही और बलवान सैनिकोंका वर्णन एवं राजाको युद्धसम्बन्धी नीतिका निर्देश * ४६८४ १०३-शन्रुकी वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुश्शेको केसे पहचानना चाहिये--इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद -*- ४६८७ १०४-राज्य, खजाना और सेना आदिसे वश्चित हुए. असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति काछक- वृक्षीय मुनिका बैराग्यपूर्ण उपदेश १०५-कालककबृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्य- की प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन '** १०६-कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेह- राजका कोसलछराजको अपना जामाता बना लेना ४६९७ १०७-गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति' ** ४६९९ १०८-माता-पिता तथा गुरुकी सेबाका महृत्त्व **" ४७०२

४६९९१

४६९५

६२ महाभारत

१०९-सत्यं-असत्यका विवेचन) धर्मका छक्षण तथा १२८-तनु मुनिका राजा वीरट्रुम्नको आंशाके व्यावहारिक नीतिका वर्णन “*. ७०४ स्वरूपका परिचय देना ओर ऋषभंके उपदेशसे

११०-सदाचार ओर ईश्वरभक्ति आदिको दुःखोँसे सुमित्रका आशाको त्याग देना *** ४७५० छूटनेका उपाय बताना “** “' ४७०६ १२५९-यम और गौतमका संवाद *९* इछ५२

११ १-मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ १३०-आपत्तिके समय राजाका धर्म *** ७४७५३ और सियारकी कथा. ** ४७९९ , ( आपद्धमंपर्व )

११२-एक तपस्वी ऊँटके आल्स्यका कुपरिणाम १३११-आपत्तिग्रस्त राजाके कर्तव्यका वर्णन *** ४७५६ और राजाका कर्तव्य *' ४७१५ १३२-ब्राकह्मणों और श्रेष्ठ राजाआँके धर्मका वर्णन

११३-शक्तिशाली शत्र॒ुके सामने बेंतकी भाँति तथा धंमंकी गतिकों सूक्ष्म बताना *"" ४७५८ नत-मस्तक होनेका उपदेश--सरिताओं और १३३-राजाके छिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता समुद्रका संबाद * ४७१६ मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्यु-

११४-दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह वृत्तिकी निन्‍्दा बन *** ४७५९ लेनेसे छाभ ४७१७ १३४-बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्रित्त ४७६१

११५-राजा तथा राजसेवर्कोके आवश्यक गुण *** ४७१९

नोंके विषयमं १३५-मर्यादाका पालन करने-करानेवाले कायब्य- ११६-सजनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक

नामक दस्युकी सद्गतिका वर्णन *६० ५७६३

महर्षि और हा 4 महक ४७२० ३६-राजा किसका धन ले और किसका ले तथा ११७-कऊुत्तका शरभका यौनिर्म जाकर मदद किसके साथ कैसा बर्ताव करे--इसका विचार ४७६४ शापसे पुनः कुत्ता हो जाना *"' ४७२२

_१३७- ७-आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये

११८-राजाके सेवक) सचिव तथा सेनापति आदि और दूरदर्शी, तत्कालश और दीषैसून्री--इन तीन

राजाके उत्तम गु्णोंका वर्णन एवं उनसे छाभ ४७२४

कक मत्स्योंका दृष्टान्त रा ' ४७5५ ११९ उनके योग्य सानपर नियुक्त करने; 2८ १३८-शब्रुऑँसे घिरे हुए. राजाके कतंव्यके विषयमें कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने» कोष बिडाल और चूहेका आख्यान *-* ४७६६... बढ़ाने तथा सबकी देखभाछ करनेके लिये

१३९-शजत्नुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा

रण 3 ] श्२ वर्णन 22% ९३२ ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संबाद '*" ४७८० १२१-दण्डके खरूप) नाम) लक्षण) प्रभाव और १४०-भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको

प्रयोगका वर्णन कह *** ४७३२ कूटनीतिका उपदेश .__*** *** ४७८७ १२२-दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें १४१-०८बत्रह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह

आनेकी परम्पराका वर्णन -** ४७३६ जीवन-निर्वाह् करे? इस विषयमे विश्वामित्र १२३-त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पंदच्युत मुनि और चाण्डालका संवाद 07०९३

हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आज्ञरिष् १४२-आपत्कालमें राजाके धर्का निश्चय तथा

और कामन्दकका संवाद *** *** ७७३९ उत्तम ब्राह्मणोंके सेबननका आदेश ५7 हट०५ १२४-इन्‍्द्र और प्रह्मदकी कथा-शीलका प्रभाव) १४२३-शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये

शीलके अभावमें धर्म, संत्य; सदाचार; बल और कपोत-कपोतीका प्रसज्ञ) सर्दासि पीड़ित

और लक्ष्मीके रहनेका वर्णन *»7 ५६३8 हुए, बहेलियेका एक बृक्षके नीचे जाकर सोना ४८०३ १२५-युधिष्टिरका आशाविषयक प्रशन-उत्तरमें राजा १४४-कबूतरद्वारा अपनी भार्याका गुणगान तथा

सुमित्र और ऋषभनामक ऋषिके इतिहासका पतिब्रता स््लीकी प्रशंसा *** ४८०५

आरम्भ) उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके ४५-कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके

पीछे दौड़ना 88 * ४७४६ लिये प्राथना "५ ४८०६ १२६-राजा सुमित्रका झुगकों खोज करते हुए १४६-कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने

तपस्वी मुनियो्के आश्रमप्र पहुँचना और शरीरका बह्ेलियेके लिये परित्याग .._*** ४८०७

उनसे आशाके बिष्यमें प्रश्न करना “**' ४७४७ १४७-बहेलियेका बैराग्य ६2५ *** ४८०९ १२७-ऋषभका राजा सुमिन्नको वीस्थुम्न और तनु १४८-कबूतरीका विव्यप और अम्मिमें प्रवेश तथा

मुनिका वृत्तान्त सुनाना *** ४७४८ उन दोनोंको खर्गल्लोककी प्राप्ति “१४८०९

शाल्तिपवे धरे

निभाना भभननओणनणीतीी:ऑक्‍ल्‍ल्‍ल्‍:: :::4::::आलओलटसिससससससस्हससससस्स्स्स्स्ससिलिसस्स्च्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्ह्व्व्ख््य्ल्रि

आज ++

१४९-बहेलियेको स्वर्गछोककी प्राप्ति * ४८१० १५०-इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयकोी फटकारना ४८११ १५ १-ब्रह्महत्याकं अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत

मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका

उससे ब्राह्मणद्रोह करनेकी प्रतिशा कराकर

उसे शरण देना कं; पे >्म ४८१३ १७२-इन्द्रोततका जनमेजयको धर्माषदेश करके

उनसे अश्वमेधयशका अनुष्ठान कराना तथा

निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश ४८१४ १५३-मतककी पुनर्जीवन-प्राप्तिोकि बिषयमें एक “7 ब्राह्मण बराकूकके जीवित होनेकी कथामें गीध

और सियारकी बुद्धिमत्ता १५४-नारदजीका सेमल-बृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न'** ४८२५ १५५-नारदजीका सेमल्वृक्षकों उसका अहंकार

देखकर फटकारना *** *ब%-इटेशेद १५६-नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलूूकों

धमंकाना ओर सेमछका वायुको तिरस्कृत

करके विचारमग्न होना ** ४८२७ १५७-सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवानके

साथ बैर करनेका उपदेश »%१०/८२८ १५८-समस्त अंनर्थोका कारण छोभको बताकर

उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा

श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण' * * * ४८२९ १५९-अज्ञान और छोभको एक दूसरेका कारण

बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको

ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करमा *** ४८३२ १६०-मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहाँत्म्य ४८३३ १६ १--तपकी महिमा हर * ४८३५ १६२-सत्यके लक्षण: स्वरूप और महिमाका वर्णन ४८३६ १६ ३-काम) क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण

और उनके नाशका उपाय *** ४८३८ १६४-नशंस अर्थात्‌ अत्यन्त नीच पुरुषक्रे छक्षण ४८२९ १६५-नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्रित्तों

का वर्णन * ४८४० १६६-खज्जञकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी

महिमाका वर्णन * ४८४६ १६७-धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा

पाण्डबोंके प्रथक्‌ प्थक्‌ विचार तथा अनन्‍्तमें

युधिष्ठिरका निर्णय * ४८५१ १६८-मित्र बनाने एवं बनानेयोग्य अुरुषोंके

लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ ४८५५ १६९-गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बक पक्षीके घरपर अतिथि होना ४८५८

४८१७ अरन्‍अम>मंास्‍तााानमममााम शकरामा कनननाना।

७०-गौतमका राजधर्भाद्वांरा आतिथ्य-सत्कार और उसका सक्षससाज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश ४८६० १७१-गौतमका साक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना * ४८६१ १७२-कतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतष्नके मांस- को अभक्ष्य बताना * ४८६३ १७३-राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना ४८६५ ( मोक्षधमंप् ) १७४-झोकाकुछर चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित्‌ और ब्राह्मणके संवादका वर्णन *** १७५-अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुष्का क्या कर्तव्य है; इस विषयमें पिताके प्रति पुत्र- द्वारा ज्ञाका। उपदेश “** ** ४८७२१ १७६-त्यागकी महिमाके विष्रयमें शम्पाक ब्राह्मणका - उपदेश के 8 8 १७७-मह्लि-गीता ---धनकी तृष्णासे ढुःख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति *** ४८७६ _ १७८-जनककी उक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके

४८६७

४८७४

उत्तरमें बोध्यगीता * ४८८० १७९-प्रहाद और अवधूतका संवाद--आजगर- वृत्तिकी प्रशंसा इं2८६8

१८०-सदूबुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पाप-

कर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण

और इन्द्रका संवाद * ४८८४ १८१-शुभाशुभ कर्मोका परिणाम कर्ताको अवश्य

भोगना पड़ता है; इसका पतिपादन * ४८८७ १८२-भरद्वाज और भगुके संवादमें जगत्‌की

उत्पत्तिका और विभिन्न तक्त्वोंका वर्णन **' ४८८९ १८३-आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्ति का वर्णन “३ ४८९१

१८४-पश्चमहाभूतोंके गुणका विस्तारपूर्वक वर्णन ४८९३ “-(८५-शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि-बायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन **" ४८९६ १८६-जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोँसे शट्डुतन उपस्थित करना *'' * ४८९७ १८७-जीवकी सत्ता तथा नित्यताकों युक्तियोँसे सिद्ध करना * ४८९८ १८८-चर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका बर्णन १८९-चारों वर्णोके अलग-अलग कर्मोंका और सदा- चारका वर्णन तथा बैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति ४९०२

४९०२१

3 ५।

महाभारत

१९०-सत्यकी महिमा; असत्यके दोष तथा छोक और परलोकके सुख-दुःखका विवेचन “*” ४९०३ १९ १-ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य-आश्रमों के धर्मका वर्णन ४९०५ १९२-वानप्रस्थ और संन्यास-धर्मोका वर्णन तथा हिमाल्यके उत्तर पाइवमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादनः

भगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार * ४९०७ १९३-शिष्टाचारका फल्सहित वर्णन) पापको छिपाने-

से हानि और धर्मकी प्रशंसा ** ४९१० १९४-अध्यात्मज्ञानका निरूपण * ४९१३ १९५-ध्यानयोगका वर्णन * ४९१७

१९६-जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न। उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल हट ९१९ १९७-जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति ४९२० १९८-परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवछोक भी नरकतुल्य हैं--इसका प्रतिपादन *** ४९२२ + ७१९९-जापकको सावित्रीका वरदानः उसके पास धर्म यम और काल आदिका आगमन) राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद; सत्यकी महिमा तथा जापककी परमगतिका वर्णन २००-जापक ब्राह्मण और राजा इशक्ष्वाकुकी उत्तम 5 गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता *०8 ४९३२ २०१-बृहस्पतिके प्रइनके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओं के त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण * ४९३४

४९२३

२०९-भगवान्‌ विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर

देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर

देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश

और नारदद्वारा भगवानकी स्तुति *** ४९५४ २१०-गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए

श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्तवका वर्णन **'* ४९६२ २११-संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन ४९६५ २१२-निषिद्ध आचरणके त्याग) सत्त/ रज और

तमके कार्य एवं परिणामका तथा सच्तगुणके

सेवनका उपदेश * ४९६६ २१३-जीवोत्पत्तिका वर्णन करते हुए. दोषों और

बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये बिप्रयासक्तिके

त्यागका उपदेश :%१!४९६८ २१४-ब्रह्मचर्य तथा बैराग्यसे मुक्ति *** ४९७० २१५-आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके

लिये प्रयत्न करनेका उपदेश *** ४९७२ -२१६-स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति

तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिक उपाय. *"" ४९७४ २१७-सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग) प्रकृति

और पुरुष ( जीवात्मा )--उन चारोंके ज्ञानसे

मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य

साधनोंका भी वर्णन '** * ४९७६

3>-+

__२१८-राजा जनकके -दरबारमें. पश्नशिखका

आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्बक शरीरसे भिन्न आत्माको _ नित्य-सत्ताका प्रतिपादन _ ९७६ २१९-पश्चशिखके द्वारा मोक्षतस्थका बिवेचन एवं भगवान्‌ विष्णुद्वधारा मिथिल्ानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके

२० २-आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थों- लिये वर-प्रदान * ४९८३ का विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय ४९३७ २२०-श्वेतकेतु और सुवर्चछाका विवाह) दोनों ०३-शरीर इन्द्रिय और मन-बुद्धिसे अतिर्क्ति पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा ... आत्माकी नित्य-सत्ताका प्रतिपादन ४९४० गा्हस्थ्यधर्मका पालन करते हुए, ही उनका २०४-आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय... परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका तथा महत्त्व £क - ४९४२ वर्णन * ४९८८ २०५-परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय * ४९४३ २२१-ब्रत। तप» उपवास ब्रह्मचय तथा अतिथि- २०६-परमात्मतत्त्वका निरूपण, मनु-बृहस्पति-संवाद- सेवा आदिका विवेचन तथा यजशिष्ट अन्नका की समाप्ति ४९४५ भोजन करनेवालेकी परम उत्तम गतिकी २०७-भ्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा प्राप्तिक कथन 7 ९७ उनकी महिमाका कथन ४९४८ २२२-सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्खरूपका २०८-त्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके उपदेश देना कक 4

वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले

स्रहर्षियोंका बर्णन 7" ४९५२

२२३-इन्‍्द्र और बलिका संवाद---इन्द्रके आशक्षिप- युक्त वचनोंका बढ़िके द्वारा कठोर प्रत्युत्त ५००४

शान्तिपव ६५

२२४-बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा २४५-संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान्‌ संन्‍्यासीकी कालकी प्रबलछताका प्रतिपादन करते हुए प्रशंसा * ५०६६

इन्द्रको फटकारना *** ५००६ २४६-परमात्माकी श्रेष्ठठा, उसके दर्शनका उपाय __२२५-इन्‍द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय ५०६९ आयी हुई लरक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा '" "५०१० २४७-महाभूतादि तत्त्वॉका विवेचन * ५०७१ २२६-इन्‍द्र और नमुचिका संवाद *** ५०१४ २४८-बुढ्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति-पुरुष-विविक *** ५०७२

२२७-इन्द्र और बलिका संवाद; काल और प्रारब्ध- २४९-ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और की महिमाका वर्णन * ५०१६ महिमा हक *** ५०७४

२२८-दैत्योंको त्यागकर इन्द्रके पास छक्ष्मीदेवीका २५०-परमात्माकी प्राप्तिका साधन) संसार-नदीका आना तथा किन सदगुणोंके होनेपर लक्ष्मी वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्त * ५०७५

आती हैं और किन दुर्गुणोंके होनेपर वे २५१-नब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणणके लक्षण और परब्रह्मकी त्यागकर चली जाती हैं, इस बातको विस्तार- प्राप्तिका उपाय | *** ५०७७

पूर्वक बताना ३३६ २२९-जैगीषव्यका असित-देवछको समत्वबुद्धिका उपदेश 40 जे २३०-श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद-नारदजीकी ल्लेकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन २३१-शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए. काछका स्वरूप बताना १०

५०२५

७५०३१

५०३३

५०३५

२३२-व्यासजीका शुकदेवको सुष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश -** ५०३७ २३३-ब्राह्मप्रढय एवं महाप्रल्यका वर्णन * ५०४०

२३४-ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन को २३५-ब्राह्मणके कतव्यका प्रतिपादन करते हुए कालरूप नदको पार करनेका उपाय बतलाना २३६-ध्यानके सहायक योग) उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति *** २३७-सुष्टिके समस्त कार्योमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन *** २३८-नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन) युगधमंका वर्णन एवं कालका महत्त्व २३९-ज्ञानका साधन और उसकी महिमा २४०-योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन २४१-कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्म-प्राप्तिके उपायका वर्णन २४२-आश्रमधर्मकी ग्रस्तावना करते हुए, ब्रह्मचरय- आश्रमका वणन 4))॥ २४३-ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गाहं॑स्थ्य-धर्मका वर्णन २४४-वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन . .... /**

55/९.--

/ ५०४१

५०४४

५०४६

५०४९

५०७५१

५०५३ 5 ५्‌ 5 ५५

हे

५०५९ ५०६९१

५०६३

२५९-धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय

२५२-शरीरमें पशञ्नभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान ५०७९

२५ ३-स्थूल) सूक्ष्म और कारण-दारीरसे भिन्न जीवात्मा-_

और परमात्माका योगके द्वारा साक्षात्कार यो साक्ष

करनेका प्रकार

२५४-कामरूपी अद्भुत वृक्षका तथा उसे काटकर मुक्ति प्राप्त करनेके उपायका और दारीररूपी नगरका वर्णन * ५०८१

२५५-पञ्नभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वणन

२५६-युधिष्टिरका मृत्युविषयक प्रश्न) नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसज्ग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाभिसे प्रजाके दग्ध होनेका वणन

_२५४-महादेवजीकी प्राथनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाप्रिका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति

२५८-मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना

जम ०5 2) ०८०

५०८२

५०८३ ५०८५

५०८६ 2०८९ २६०-युधिष्टिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह

उपस्थित करना * ७५०९१ २६१-जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जगाओंमें

पक्षियोंके घोंसछा बनानेसे उनका अभिमान

और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार

वैश्यके पास जाना * ५०९३ २६२-जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद ५०९६

२६३-जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश * ५१०० २६४-जाजलिको पक्षियोंका उपदेश *** ७१०३

ायक |

द्द

महाभारत

२६५-राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा ५१०५ २६६-महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान--- दीघकालछतक सोच-विचारकर काये करनेकी

यशसा (270 * ५१०६ २६७-द्युमत्सेन और सत्यवान्‌का संवाद--अहिंसा-

पूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन “** २६८-स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद-स्यूमरश्मिके द्वारा यक्षकी अवश्यकर्त॑व्यताका निरूपण २६९-प्रवृत्ति एवं निृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्सिः कपिल-संवाद 27३ २७०-स्यूमरश्मि-कपिछ-संवाद-चारों. आश्रमॉमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन २७१-धन और काम-भोगोंकी अपेक्षा धर्म और तपस्याका उत्कष् सूचित करनेवाली ब्राह्मण और कुण्डधार मेघकी कथा *** ५१२६ __२७२-यशमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा ५१३०. २७३-धर्म, अधमं) वैराग्य और मोक्षके विष्यमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर *** ५१३२ २७४-मोक्षके साधनका वर्णन * ५१३३ २७५-जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असित देवलका संवाद * ५१३५ २७६-तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद *"“* 82 २७७-शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्म- कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कतंव्यका निर्देश--पिता-पुत्रका संवाद कक . २७८-हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन “** ५१४२ २७९-तब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ ०: २८०-बृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविष्यक उपदेश देना और उसकी परम गति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शड्भगभका निधारण ५१४६ ,२८१-इन्द्र और बत्रासुरके युद्धका वर्णन... *** >२८२-ब्त्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्म- हत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन ५१५५

५११२ ५११५ ५११७

५१२३

५१३७

५१३८

५१४३

२८ ३7शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप ***

२८४ बंतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान्‌ शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस; दक्ष- द्वारा किये हुए शिवसहखनामस्तोन्ञसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोतन्रकी महिमा *** *ल्‍०« ५१९

५१६०

३-३३ »

२८५-अध्यात्मज्ञाका। और उसके फलका वर्णन

२८६-समझ्ञके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन ११०

२८७-नारदजीका गालबमुनिको श्रेयका उपदेश

२८८-अरिष्टनेमिका राजा सगरको वेराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश ११

.२८९-भगुपुत्र उशनाका चरित्र और उन्हें शुक्र नामकी प्राप्ति

२९ ०-पराशरगीताका,. आरम्भ--पराशरमसुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तेके साधनका

उपदेश 2९ २९ १-पराशरगीता--कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मस छाभ. ** 557

२९२-पराशरगीता---धर्मोपाजिंत धनकी श्रेष्ठता) अतिथि-सत्कारका महत्त्व. पॉच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि; भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान्‌ छाम २९३-पराशरगीता--श्यूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्सज़्की महिमा और चारों बर्णोके धर्मपाठनका महत्त्व हम २९४-पराशरगीता--ब्राह्मण और श्ूद्गरकी जीविका) निन्दनीय कर्मोके त्यागकी आशा) मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान्‌ शिवके

द्वारा उसका निवारण तथा खधर्मके अनुसार कतंव्यपाछनका आदेश २९५-पराशरगीता--विष्रयासक्त मनुष्यका पतन तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक सवधर्म- पालनका आदेश "छः २९६-पराशरगीता-वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्यः तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति) विभिन्न बर्णोके विशेष और सामान्य धर्म/ सत्कर्मकी श्रेष्ठठा तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन. *** २९७-पराशरगीता- नाना प्रकारके धर्म और कर्तंव्योंका उपदेश ;१९८-पराशरगीताका उपसंहार--राजा जनकके विविध प्रश्नोंका उत्तर *** २९९-..हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगर्णोंको उपदेश ३००-सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए, योगमार्गके स्वरूप) साधन) फल और प्रभाव-

का वर्णन

५१७८

५१८२ ५१८३

५१८८

58

५१५९४

५१९६

है 3

५२००

है 7

५२०४

५२०७

8 % कि

५२१३

3

४7 ५१२१६

8९३९०

शान्तिपर्वे ६७

३०१-सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके

फलका वर्णन मे * कै२५ ३०२-वसिष्ठ और करालजनकका संवाद--क्षर और

अक्षरतत््वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति ५२३२ ३०३-प्रकृति-संसर्गके कारण जीवका अपनेकों नाना

प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना

एवं नाना योनियोंमें बारंबार जन्म ग्रहण करना ५२३५ ३०४-प्रकृतिके संसगंदोषसे जीवका पतन * ५२३२९ ३०५-दक्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा

जनककी शट्ढ और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर ५२४० ३०६-योग और सांख्यके स्वरूपका वर्णन तथा

आत्मज्ञानसे मुक्ति एश४र्‌ ३०७-विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति

और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके

उद्घारका वर्णन * ५२४६ ३०८-श्षर-अक्षर और परमात्मतत्त्वका वर्णन जीवके

नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके

अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी

परम्पराको बताते हुए, वसिष्ठ-करालजनक-

संवादका उपसंहार * ५२४९ ३०९--जनकवंशी बसुमानको एक मुनिका धर्म-

विषयक उपदेश * ५२५३ ३१०-याज्वलक्थका राजा जनकको उपदेश---

सांख्यमतके अनुसार चोबीस तत्वों और नो

प्रकारके सर्गोका निरूपण * ५२५५ ३११-अव्यक्त, महत्तत्तः अहंकार, मन और

विषयोंकी कालछ्संख्याका एवं सुष्टिका वर्णन

तथा इन्द्रियोँमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन ५२५७ ३१२-संहारक्रमका वर्णन *** ५२५८ ३१३-अध्यात्म, अधिभूत और अधिदेबतका वर्णन

तथा सात्तविक) राजस और तामस भावों के लक्षण ५२५९

३१४-सात्तिक, राजस और तामस प्रकृतिके 'मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न ५२६१ ३१५-प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फछ “* ५२६२ ३१६-योगका वर्णन और उसके साधनसे परबह्म परमात्माकी प्राप्ति *** ३3 ३१७-विभिन्न अज्गञोंसे प्राणॉके उक्तररणका फल तथा मृत्युसूचक लछक्षणोंका वर्णन और मृत्युकी जीतनेका उपाय ज््ः _७३१८--ाशवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसज़ सुनाना? विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फल मुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना

५२६४

५२६६

५्‌ ;एर९७

३१९-जरा-मृत्युका उछड्ठन करनेके विषयमे पश्च- शिख और राजा जनकका संवाद *** ५२७५

-ै२०-राज़ा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी

_ हुईं सुलभाका उनके शरीरमें प्रव्रेश-करना) राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुल्भाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना * ५२७६ ३२१-व्यासजीका अपने पुत्र झ्ुकदेवको वैराग्य और धम्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना ५२८९ ३२२-शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताकों अवश्य

भोगना पड़ता है; इसका प्रतिपादन * ५२९६ >३१२३-व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिति लिये तपस्या और भगवान्‌ श्डूरसे वर-प्राप्ति 20092

.३२४-शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीतः

वेदाध्ययन एवं समावतंन संस्कारका कृत्तान्त ५२९९ ३२५-पिताकी आज्ासे शुकदेवजीका मिथिल्ममें जाना और वहाँ उनका द्वारपाछ) मन्त्री और युवती स्ल्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना ५३०१ २२६-राजा जनकके द्वारा झुकदेवजीका पूजन तथा उनके प्रश्नका समाधान करते हुए ब्रह्मचर्या- श्रममें परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद अन्य तीनों आश्रमोंकी अनावश्यकताका प्रतिपादन करना तथा मुक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन'** ३२७-आञ्ुकदेवजीका पिताके पास लछौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको खाध्यायकी विधि बताना * ५३०८ ३२८-शिष्योंके जानेके बाद व्यासजीके पास नारद- जीका आगमन और व्यासजीको वेदपाठके लिये प्रेरित करना तथा व्यासजीका श्ुकदेव- को अनध्यायका कारण बताते हुए “प्रवह? आदि सात वायुओंका परिचय देना * ५३११ २२९-शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञान- का उपदेश 0४85 358 ३३०-शुकदेवकोी नारदजीका सदाचार और अध्यात्मविषयक उपदेश * ५३१८ ३३१-नारदजीका शुकदेवको कमर्मफल्प्राप्तिमें परतन्त्रताविषयक उपदेश तथा अझुकदेवजीका _-सूयंछोकमें जानेका निश्चय 27 ५98 ३३२-शुकदेवजीकी ऊध्वंगतिका वर्णन * ५३२५ ३३३-झुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीकों महादेवजीका आश्वासन देना ५३२७

५३०४

५२३१५

६८

महाभारत

ं््ं्््््जअ््नअनडटलटलटलसस्् चसअश्खख्खच्य्य्य्यय्य्य्य्यय्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्य्य्स्य्य््य्य्य्य्य्य्य्ययय्य्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्य्स्

३३४-बदरिकाभममें नारदजीके पूछनेपर भगवान:

नारायणका परमदेव परमात्माको ही सवश्रेष्ठ

पूजनीय बताना / ९३२२९ ३३५-नारदजीका स्वेतद्वीपदर्शन) वहाँके निवासियों

के स्वरूपका वर्णन) राजा उपरिचरका चरित्र

तथा पाश्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसज्ज * ५३३२ ३३६-राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवानपर बृहस्पति-

का क्रोधित होना? एकत आदि मुनियोंका

बृहस्पतिसे व्वेतद्वीप एवं भगवान्‌की महिमा-

का वर्णन करके उनको शानन्‍्त करना “*' ५३३६ ३३१७-यज्ञमँ आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है

बकरा नहीं--इस बातको जानते हुए

भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके

अधःपतनकी और भगवत्‌-कृपासे उनके...

पुनरुत्थानकी कथा. " ५३४० ३३८-नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवानकी

स्तुति करना हे ३३९-ब्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवानका दर्शन)

भगवानका बासुदेव॒-सझ्लर्षण आदि अपने आदि अपने

व्यूहस्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें ; “हीनबाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य ३४०-व्यासजीका अपने शिकष्योंको भगवानद्वारा ब्रह्मादि देवताओँसे कह्दे हुए. प्रब्ृत्ति और निदृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना ''' ३४१-भगवान्‌ श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए. अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना “' ५३२६२ ३४२-सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन) ब्राह्मणॉँकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकार- की संक्षित कथाओँका उल्लेख) भगवन्नामोंके हेतु तथा रुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय ** ३४३-जनमेजयका प्रश्न; देवर्षि नारदका खेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर् हृश्यका वर्णन करना **'* * ५३७८ ३४४-नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान्‌ वासुदेवका माहात्म्य बतलाना ३४५-भगवान्‌ वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना * ५३८४ ३४६-नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार * ५३८६ ३४७-हयग्रीव-अवतारकी कथा) वेदोंका उद्धार

५३४३

५३५४

धर

५३८२

“““““ प्रधुकैटभ-वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन_५३८८ क्‍ल --4809--«-

५्‌ कै] ३४५

३४८-सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवानके

प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा * ५३९४ २४९-व्यासजीका खस॒ष्टिके प्रारम्भमं भगवान्‌

नारायणके अंशसे सरस्वती-पुत्र अपान्तरतमा कै

रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा ५४०० २५०-बैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन

एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी

महिमाका वर्णन है? * ५४०५ २३५१-बत्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी

महिमाका विशेषरूपसे वर्णन * ५४०७ २३५२-नारदके द्वारा इन्द्रको उज्छवृत्तिवाले

ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम * ५४०९ २५३-महापदपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका:

वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन ५४१० ३५४-अतिथिद्वारा खगंके विभिन्न मार्गोका कथन ५४११ ३५५-अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार

और सक्वुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके

पास जानेके लिये प्रेरणा कह ३५६-अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका

उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान५४ ३५७-नागपत्ञीके द्वारा ब्राह्मणका, सत्कार और

वार्ताछापके बाद ब्रॉक्मणके द्वारा नागराजके

आगमनकी प्रतीक्षा * ५७४१४ ३५८-नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या

तथा नागराजके परिवारवारोका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना *** ५४१५ ३५९-नागराजका घर छौटना। पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका: उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध ५४१७ ६०-पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना धर ३६ १-नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत ** ५४१९ ३६२-नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूयमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंकी सुनाना *** ३६३-उज्छ एवं शीलवृत्तिसे सिद्ध हुए, पुरुषकी 7 दिव्य गति - ३६४-ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उजञ्छत्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा मॉगना ५४२३ ३६५-नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवन मुनिसे उच्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन ५४२४

५४१२

५४१८

५४२१

प्र

( तिरंगा ) १-शोकाकुल युधिष्ठटिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्वना **

२-महाभारतकी समाप्तिपर महाराज युधिष्टिरका हस्तिनापुरमें प्रवेश

३-इन्द्रकी ब्राह्मणवेषमें देत्यराज प्रह्मदसे भेंट “*'*

४-कपोतरक्क द्वारा व्याधका आतिथ्य-सत्कार ५-भगवान्‌ नारायणके नाभि-कमलसे लोकपितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति &-कौशिक ब्राह्मणको सावित्रीदेवीका प्रत्यक्ष दर्शन ७-श्रीकृष्णकी उग्रसेनसे भेंट ८-बैश्य तुलाधारके द्वारा मुनि जाजछिका सत्कार ९-नारदजीको भगवानके विश्वरूपका दर्शन १०-भगवान्‌ हयग्रीव वेदोंकोी रसातलसे लाकर ब्रह्माजीको लौटा रहे हैं ( खादा ) ११-सुवर्णमय पक्षीके रूपमें देवराज इन्द्रका संन्यासी बने हुए ब्राह्मण- बालकींको उपदेश १२-खयं श्रीकृष्ण शोकमग्न युधिष्ठिर- को समझा रहे हैं ३-ध्यानमग्न श्रीकृष्णसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहे हैं हा १४-भगवान्‌ श्रीकृष्णका देवर्षि नारद एवं पाण्डवॉकोी लेकर शरशय्या- स्थित भीष्मके निकट गमन १५-राजासे हीन प्रजाकी ब्रह्माजीसे राजाके लिये प्रार्थना “** १६-राजा वेनके बाहु-मन्थनसे महाराज प्रथुका प्राकस्य १७-राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि १८-राजर्षि जनक अपने सेनिकोंको स्वर्ग और नरककी बात कह रहे हैं १९-कालकबृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं जय

चित्र-सूची

४४२५

“डर

४६२५ ८०८

* ४८२५

* ४९२३ ५०२५

७५०९७ पर

7 है ९२

४४८७

* ४५३०

४५५६

कै

४५७६ * ४६२५६

* ४६७८

४६९८

२०-समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद हे २१-चूहेकी सहायताके फलस्वरूप चाण्डाल- के जाल्से बिलावकी मुक्ति! ** २२-मरे हुए ब्राह्मण-बालूकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शड्डूरजीकी कृपा २३-काश्यप ब्राह्मणके प्रति गीदड़के रूपमें इन्द्रका उपदेश “** २४-इन्‍न्द्रको पहचाननेपर काश्यपद्वारा

उनकी पूजा २५-महर्षि भगुके साथ भरद्वाज मुनिका प्रश्नोत्तर ॥४४ २६-जापक ब्राह्मण एवं महाराज इक्ष्वाकुकी ऊध्व॑ंगति २७-प्रजापतति मनु एवं महर्षि बृहस्पतिका संवाद कक २८-भगवान्‌ वराहकी ऋषियोंद्वारा स्तुति २९-महर्षि पदग्नशिखका महाराज जनकको उपदेश

३०-देवर्षि एवं देवराजको भगवती लक्ष्मीका दर्शन हक ३१-मुनि जाजलिकी तपस्या ३२-चिरकारी शस्त्र त्यागककर अपने पिताको प्रणाम कर रहे हैं ३३-सनकादि महर्षियोंकी शुक्राचार्य एवं वृत्रासुरसे भेंट ३४--दक्षके यज्ञमं शिवजीका प्राकस्य ३५-साध्यगण्णोंको हंसरूपमें ब्रह्माजीका उपदेश >++ ३६-महर्षि वशिष्ठका राजा कराछ जनकको उपदेश ही ३७-महर्षि याज्वलक्यके स्मरणसे देवी सरस्वतीका प्राकव्य *** ३८-राजा जनकके द्वारपर शुकदेवजी ३९-राजा जनकके द्वारपर शुकदेवजीका पूजन ! ४०-शुकदेवजीको नारदजीका उपदेश ४१-नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद ४३-( १६ लाइन चित्र फरमोंमें )

| हे पय 7-थामकामवपाइक "बुर -बदातअमकनत>+-- “००5.

४७१६

* ४७७४

४८२४

पक ेत--न-न---------

>> द८<ड

४८८४

है 80 4 45

४९३३

“” ४९३४

४९५६

कल

५०९४

आदर

५१४६ * (रद८

५२१७

# 4

५२३३२

5३८

७५३०३

* ५२३०४ ५३१५ ५३३१

५०२६ _

शोकाइल युधिष्टिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्बना

के

3७ ५७४23 के;

+>#

<3.?

श्रीपरमात्मने नमः श्रीमहाभारतम्‌